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Sunday, July 16, 2017

यादे छोड़ गया बचपन

काश  की  फिर  लौटा  पाते , जो  बीत  गया  है  वो  जीवन ,
कितना प्यारा कितना सुंदर , कितना न्यारा था वो बचपन , 

वो  गलियाँ  और  वो  चौराहा , चलना  पगडंडी  मेड़ों  पे ,
अमरुद  लीची  या  आम  लदे , वो चढना उतरना पेड़ों पे ,

वो  विद्यालय  जिसमें  हमने  , का-का की-की पढना सिखा ,
वो  इंक  दवात  की  स्याही  से , जीवन में रंग भरना सिखा , 

कभी खेल-खेल के चक्कर में , अपनी कुछ चीजे खो देना ,
खुद  से  ही  गलती  करना  ,  और मार के डर से रो देना ,

गिल्ली-डंडे  और  कंचों  में , खाने की सुध बुध ना रहना ,
सुनकर भी अनसुनी करना , अपनी अम्मा का हर कहना ,

वो हार पे अपनी चिल्लाना , और जीत पे अपनी इतराना ,
इक-इक दावों पे दम भरना , हर एक  चाल  पे  मुस्काना ,

लेते  ही  किताबें  हाथों  में , निंदिया  रानी  का  आ  जाना ,
घंटों तक बाबू जी का फिर , वो ज्ञान की महिमा समझाना ,

लोभ  में  पड़के  मिठाई  की , अपने  घर  में  चोरी  करना ,
पूछे जाने पर  चुप  रहना , और गालों पर थप्पड़ का पड़ना ,

आवाज दोस्तों की सुनकर , वो  खड़ा  कान  का  हो  जाना ,
घर में चुपके-चुपके चलना , फिर  दौड़  गली  में  खो  जाना ,

छुपके  दादा  के  चश्मे  से , वो  देखना  दुनिया  बड़ी-बड़ी ,
दिन त्योहारों पकवानों का , और भूख का लगना घड़ी-घड़ी ,

आना  घर  पे  मेहमानों  का , कुछ  पाने  को  जी  ललचाना ,
फिर छोड़ के नटखटपन अपना , भोला-भाला  सा  बन  जाना ,

वो  हाथ  पकड़  के  भैया  का , हर  रोज  बजारों  में  जाना ,
हर चीज देखकर जिद करना , और बात पे अपनी अड़ जाना ,

चढके  चाचा  के  कन्धों  पे , उनकी   मुछों   को   सहलाना ,
कह-कह के कहानी परियों की , दीदी का दिल को बहलाना ,

वो रेत में पांव घुसाकर के , इक  सुंदर  महल  बना  लेना ,
इक नाव बनाना बारिश में , और मार के डंडा चला लेना ,

घनघोर  घटा  के  छाने  पर , वो  होके  मगन  नांचा  करना ,
तूफां  में  करना  कूद -फांद  , और आँख में मिटटी का भरना ,

कच्चे  अमिया  का  खट्टापन , और  पानी  मुंह  में  आ  जाना ,
फिरना दिन-दिन भर बागों में , और विद्यालय में ना जाना ,

वो  कान  पकड़  मुर्गा  बनना , घंटों  उठक - बैठक  करना ,
पलभर करना अफसोस मगर , घंटों तक आंसू का झरना,

संगी - साथी  और  हमजोली , रगडा - झगडा गुस्सा अनबन,
खट्टी - मिट्ठी बातों वाली , कई यादे छोड़ गया बचपन  || 

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