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Friday, October 24, 2014

उसे अपना कहूँ कैसे

शिकायत मान लो मेरी या ये मेरी खता कहलो ,
मुझे भी राज ऐसे खोलना अच्छा नहीं लगता ।

मगर मैं कसमकस में हूँ उसे अपना कहूँ कैसे ,
जिसे मेरा ही हँसना बोलना अच्छा नहीं लगता । । 






Monday, October 20, 2014

दिल से छुटकारा

जो मेरे बस में ये होता ,
मैं हर उलझन सुलझा लेती ,

डूबो के दिल को सागर में ,
दिल से छुटकारा पा लेती । ।


लो दिल के करलो दो टुकड़े

दिल पर्वत से भी ऊँचा है ,                                
दिल सागर से भी गहरा है ,
                             
दिल काबा भी है काशी भी ,
दिल में ही रब का डेरा  है ।

मैं भी कहती हूँ मेरा है ,
वो भी कहता है मेरा है ,

ले दिल के कर ले दो टुकड़े  ,
अब ले जा जो भी तेरा है ।।


















Friday, October 17, 2014

मुस्कुराना भूल जाती हूँ

मैं गम में देख उस को मुस्कुराना भूल जाती  हूँ ।
उसे जब याद रखती हूँ जमाना भूल जाती  हूँ ।

कहीं मैं खो न दूँ उस को मुझे इस बात का डर है ,
यही सब सोंचकर चाहत जताना भूल जाती  हूँ ।

ये यादें दर्द अब मुझको जियादा दे नही पातें  ,
नया कुछ देखती हूँ तो पुराना भूल जाती  हूँ ।

हवाएँ रूठकर मुझसे शिकायत कर के यूँ बोली ,
मैं अब सावन में भी झूला लगाना भूल जाती हूँ ।

यूँ रोटी- दाल में ही अपनी अब मसरूफ रहती हूँ ,
की मैं चिड़ियों को भी दाना खिलाना भूल जाती  हूँ ।

ये आँगन में जो तुलसी है हरी थी जब तलक थी माँ ,
मैं अब पौधों को भी पानी पिलाना भूल जाती  हूँ ।

न जाने कब से अँधेरा है मेरे दिल के कोने में ,
दिया दिल में जलाना है जलाना भूल जाती  हूँ ।

वो रिश्तेदार हैं इतनी सी अब पहचान है उनसे ,
मैं भी उनकी तरह रिश्ता निभाना भूल जाती  हूँ । ।


Tuesday, October 14, 2014

अदा

कभी नजरें मिलाते हैं कभी नजरें चुराते हैं ,
किसी की जान जाती है अदा अपनी समझ बैठे ।।







पागल है दिवाना है दिल

पागल है दिवाना है दिल तेरी बातें करता है ,
कैसे मैं समझाऊं इस को ये तेरी जिद करता  है ।

उसका जाकर हो जाऊँगा मुझ से आकर कहता है ये ,
कैसी बातें करता है ये ,सोंच के मन अब डरता है ।

इतनी मुहब्बत पाल रहा है ना जाने क्या होगा आगे ,
खींच रही मैं डोर इधर को और उधर ये बढ़ता है ।

तुझपर प्यार बहुत आता है तेरा होकर रहता है ये ,
कुछ बोलूं तो मैं दुश्मन हूँ मुझसे आकर लड़ता है ।

सुबहो - शाम तेरी बातों में खोया रहता है पागल ये ,
नाम तुम्हारा ले - ले कर ये हर पल आहें भरता है ।

लाग लगाके ओ हरजाई सुनता ना है दिल की दुहाई ,
देख मेरी क्या हालत हो गई ऐसा भी कोई करता है ।।








Monday, October 13, 2014

my poem published in today's news paper....वक्त बेवफा भी है

वक्त के बदलाव का  ,ये सिलसिला भी है ,
जिससे हुआ है प्यार ,उससे गिला भी है ।

मंजिल पे खड़ा  हैं  ,  जमात हैं हजारों की ,
वही रास्ते में था तो  , तन्हां चला भी है ।

चिंगारी ने जब चाहा है ,जला डाला आशियाँ ,
पर और जले उससे पहले , खुद जला भी है ।

हैं  निम - करेले में  , कडवाहटें  जितनी ,
नजरें बदल के देखलो ,  उतना भला भी है ।

है राज अँधेरे औ ,   उजाले का बस इतना ,
जिसका उदय हुआ है , इकदिन ढला भी है ।

इंसान ने इंसान को  ,धोखा दिया तो क्या ,
इंसान ने कई बार तो ,खुद को छला भी है ।

इतना न कर गुमान , वक्त किसका हुआ है  ,
है ये  जितना वफादार उतना बेवफा भी है । |


Saturday, October 11, 2014

आज रात जब चंदा आये

आज रात जब चंदा आये मेरी बातें मत करना ,
वरना सारी रात कटेगी फिर दिल को समझाने में ।

तुम पूछोगे मैं कैसी हूँ और वो ताने मारेगा ,
फिर तुम आहत दिल कर लोगे उसको सच बतलाने में ।

वो पूछेगा तुम कैसे हो मेरे बिन कैसे जीते हो ,
फिर तुम को परेशानी होगी अपने जख्म दिखाने में ।

तुम रोओगे उसके आगे और वो मुझ से बोलेगा ,
मुश्किल होगी फिर मुझको भी अपना जी बहलाने में ।

ऐसा हो तुम आज रात को चाँद से मिलने ना जाओ ,
या ऐसा हो देरी कर दे चाँद रात में आने में ।



Friday, October 10, 2014

ये दिल बिमार कौन करे

वफ़ा की उनसे शिकायत ही यार कौन करे ।
सनम है बेवफा जो उनसे प्यार कौन करे ।

वो मुझ से कहता है की मुझपे ऐतवार करो ,
तू ही बता ये खता बार - बार कौन करे ।

चला गया जो वो सरे - राह हमसे कतरा कर  ,
वो आज आ भी गया दिल निसार कौन करे ।

वो आजमा के मुझे बार - बार हार गया ,
वो सोंचता था यही अपनी हार कौन करे ।

ये इश्क आग है जलना नही मुझे हमदम ,
जला - जला के भला दिल पे वार कौन करे ।

हमें न आ रही है रास चाहतों की अदा ,
अजीब रोग है ये दिल बिमार कौन करे । ।







जिंदगी इक कसौटी है

जिंदगी आजमाईश की इक ऐसी कसौटी है ,
न जिसमे हार होती है न जिसमें जीत होती है ।

हो कितना बड़ा कोई या हो कितना कोई छोटा ,
जिंदगी एक दिन सब से ही रिश्ता तोड़ लेती है ।

कभी बे- बात भी सर पे बिठा लेती है लोगों को ,
जरा सी बात पे लोगों से मुँह भी मोड़ लेती है ।

तजुर्बे की जगह है ये , उमरभर सीख देती है ,
संभल जाओ तो अच्छा है नही तो तोड़ देती है ।

जिंदगी इक पहेली है की जो सुलझी नही अब तक ,
सवालों के सुलझते ही सवाल इक छोड़ देती है ।।









Thursday, October 9, 2014

नन्हें बच्चे

वो घर जन्नत से अच्छे हैं ,
जिस घर में नन्हें बच्चें हैं ।







दिल ना लो ना दो

मैं ऐसे कैसे दिल दे दूँ
तुम पहले अपना दिल तो दो ।

ऐसा ना हो मैं दिल दे दूं ,
फिर तुम बदले में दिल ना दो।

दिल देने में जो हो मुश्किल ,
तो सुन लो मेरा दिल ना लो ।

दिल लेने में जो हो मुश्किल ,
तो तुम भी अपना दिल ना दो ।

जो दिल दारी आती ना हो ,
अच्छा है दिल ना लो ना दो।







Tuesday, October 7, 2014

मुझे डर अब भी लगता है

मुझ को डर तब भी लगता था मुझ को डर अब भी लगता है ,
कल तुझको खोने का डर था अब खुद के खोने का डर है ।। 





दिल उसका होकर रहता है

मेरा दिल अब मेरी बातें सुनकर भी ना सुनता है ,

कहने को बस मेरा है पर उसका होकर रहता है । । 





Monday, October 6, 2014

kavitri preeti suman ( kavita path 4 0ctuber 2014 )

पाओं मन्जिल को पहुंचती ही नही

कोई बतला तो दे जाना है कहाँ ,
राह मेरे दिल को मिलती ही नही   ,

रोज चलती हूँ सफर करती हूँ मैं ,
पाओं मन्जिल को पहुंचती ही नही ।  


my new published poem




दिल है या दिया कोई

वफाओं का सिला है ये ,
जलाता है जिया कोई ,

समझ आता नही मुझको ,
ये दिल है या दिया कोई । ।


Thursday, October 2, 2014

my poem published in today's news paper................ दामिनी

बोली जीने में क्या रखा ,
मैंने दिन इतना बुरा देखा ,
और जग से रिश्ता तोड़ गई ।
आखिर में वो जग छोड़ गई ।

बोली करना तो यूं करना ,
मेरे नाम पे आखिरतक लड़ना ,
लो मैं अपना गम छोड़ गई ।
आखिर में वो जग छोड़ गई ।

मेरे हाल पे कोई मत रोना ,
देखो बेबस अब मत होना ,
संघर्ष को दिल से जोड़ गई ।
आखिर में वो जग छोड़ गई ।

कुछ ऐसे अब विकराल बनो ,
किसी दामिनी का ये हाल न हो ,
जन - जन में मचा के शोर गई ।
आखिर में वो जग छोड़ गई ।|

HAPPY NAVRATRI MITRO'N

Wednesday, October 1, 2014

खुशियों का मुझसे हमेशा फासला रक्खा गया

खुशियों का मुझसे हमेशा फासला रक्खा गया ।
दूर मुझसे हसरतों का काफिला रक्खा गया ।

उनसे सच कह दें मगर है फायदा कुछ भी नही ,
अन्धे को क्या, सामने हो आईना रक्खा गया ।

रात सूनी शाम काली जिंदगी अँधेरी हो गई  ,
जब बुझाकर ताक पर दिल का दिया रक्खा गया ।

इक तरफ मेरी मुहब्बत इक तरफ सारा जहाँ ,
हाशिये पर इस तरह वादे - वफ़ा रक्खा गया ।

सब समझते हो मगर चाहत समझते ही नही ,
फिर समझने को भला दुनियाँ में क्या रक्खा गया ।।