Tuesday, April 17, 2012

नाराजगी

कई रोज से न बोले , कहो क्या है शिकायत ,
गुस्सा न गया दिल से ऐसी भी क्या आफत ।

कुछ  तो  मुझे  बताओ ,  क्या बात हो गई ,
नाराजगी   है  कैसी  ,  कैसी  ये  बगावत ।

रूठे  रहोगे  ऐसे  तो  ,  होगा   न   गुजारा ,
बेचैनियाँ  ये  दिल की  , पायेगी न राहत ।

क्या तुमको ना यकीन रहा ,  प्यार पे मेरे ,
या  तुम्हारी   कम  हुई ,  मेरे लिए चाहत । 

मै  सामने  रहूँ , और  तुम  बात  ना  करो ,
ऐसी   तो  नही  थी  ,  यारा  तेरी  आदत  ।

गुस्सा ही  करो लेकिन , गुमसुम न रहो यूँ ,
तकरार करो  मुझसे , तुमको  है इजाजत ।

मुझको  है  ऐतवार  की  तुम मान जाओगे ,
ठुकराओगे कबतलक , मेरी पाक मुहब्बत । 

चलो देखते  हैं हम भी , कि  जीतता है  कौन ,
नफरत तुम्हारी या कि मेरे प्यार की ताकत ।

3 comments:

  1. मै सामने रहूँ , और तुम बात ना करो ,
    ऐसी तो नही थी , यारा तेरी आदत ...

    बहुत खूब ... आदत होती नहीं बस बन जाती है ... लाजवाब शेर ... मस्त गज़ल है ...

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    1. बहुत ही खूबसूरत कहा हे
      दिल को छूने वाला ..

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  2. धन्यवाद आपका दिगम्बर नासवा जी

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